संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख 6 अंगों में से एक है, जो अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट द्वारा नामांकित है तथा इसका मुख्यालय मैनहट्टन द्वीप, न्यूयॉर्क में है. इसमें पाँच कार्यकारी भाषा अंग्रेजी, फ्रेंच, अरबी, चीनी तथा स्पेनिश कार्यरत हैं. वर्तमान परिदृश्य में यहाँ 5 स्थायी सदस्य तथा 10 अस्थायी सदस्य हैं, जिसमें 5 स्थायी सदस्यों में यू.एस.ए., फ्रांस, यूके, चीन तथा रूस हैं, जिन्हें वीटो करने की शक्ति प्रदत्त है और अन्य अस्थायी सदस्य हर 2 वर्ष के लिए चुने जाते हैं, जिसमें भारत भी 8 बार इसका अस्थायी सदस्य बन चुका है. शुरुआती दौर में यह 51 सदस्यों का समूह था, जो वर्तमान में 193 सदस्य देशों का समूह है. यू.एन.ओ. के महासचिव एंटोनियो गुटेरस (पुर्तगाली) हैं और हाल ही में इसके 80वें महासभा सत्र की अध्यक्ष जर्मनी की पूर्व विदेश मंत्री एनालेना बेयरवॉक बनीं. भारत की ओर से स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश जी हैं, जो यू.एन.ओ. में भारत का मुख्य राजनयिक प्रतिनिधित्व हैं तथा भारत की विदेश नीति को कार्यान्वित करता है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में व्यापक सुधरो की आवश्यकता क्यों है ?
(1) प्रतिनिधित्व का अभाव-यदि किसी विभाग या व्यक्ति को कुछ जिम्मेदारी दी जाती है, तो उसकी कर्मठता या उसकी रणनीतिक तथा प्रामाणिकता को देखकर. ठीक उसी प्रकार यू. एन. ओ. को भी यह कर्तव्यनिष्ठ कार्य सौंपा गया, लेकिन UNO इस विषय में असफल होता गया. उदाहरण-स्वरूप वैश्विक परिदृश्यों को देखा जाए जहाँ विश्व गुटों में होकर एक-दूसरे से संघर्ष तथा युद्धरत है. चाहें वह रूस-यूक्रेन, इजरायल-फिलीस्तीन, यू.एस., ईरान इत्यादि हो, जो मानव विनाश, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक संकट उत्पन्न करा रहे हैं. जहाँ देश दूसरे देश के जानी दुश्मन बने हुए हैं, वहीं UNO इन देशों को लड़ते और मरते देख रहा है. वह इतनी भी शक्ति नहीं जुटा पा रहा, ताकि इन देशों में शांति एवं स्थिरता के लिए प्रतिनिधित्व एवं स्थायित्व कदम उठा सके.
(2) भू-राजनीतिक का समन्वय-संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् अर्थात् यू.एन.ओ. भौगोलिक एवं राजनीतिक परिदृश्यों से कुछ देशों के साथ जुड़ा है, जहाँ उन्हीं देशों का प्रभाव जारी रहता है. उदाहरणस्वरूप देखा जाए तो UNO का अत्यधिक वर्चस्व यू. एस. ए. में स्थापित है और UNO इस बंधन एवं दबाव के कारण प्रतिबद्ध रहता है जिससे सही निर्णय के प्रतिकूल होता है.
(3) वीटो का सही प्रयोग एवं निष्पक्षता नहीं-वीटो देने की शक्ति 5 देशों को प्राप्त है, जिसे P-5 भी कहा जाता है, जो ये पूरे विश्व के लिए अहम फैसला लेती है, लेकिन ये देश भी आपसी निर्णायक नहीं होने के कारण अपनी जिम्मेदारियों के अनुकूल फैसला नहीं ले पाते हैं. ये अपने हित या अपने सहयोगी देशों के हित एवं उत्थान के लिए वीटो करते हैं, लेकिन इनके प्रतिपक्ष इनके खिलाफ हो
जाते हैं. उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो भारत को UNO का स्थायी सदस्य होने के लिए रूस की सहमति होती है, तो वहीं चीन इसमें असहमति प्रकट करता है.
(4) फण्डों के प्रति झुकाय-UNO में फण्डों के प्रति बल, जो इसे और इसके कर्तव्यों से दूर करता है. UNSC को सबसे ज्यादा फण्ड USA, चीन आदि देशों से प्राप्त होता है, जो इसे आर्थिक सम्पन्न बनाता है, लेकिन ये दबाव इसे कमजोर भी करता है, क्योंकि वह डरता है यदि फण्डधारी देश सगठन छोड़ देगा तो यह संगठन कैसे चलेगा ?
इसलिए UNO वैसे देशों के प्रति कोई अहम कदम उठाने पर कतराते है, जिससे उस राष्ट्र का मनमाना रवैया बढ़ जाता है और विश्व में अशांति की स्थिति उत्पन्न होती है
(5) कठोरता एवं अनुशासन का अभाव उपर्युक्त तथ्यों से सुस्पष्ट है कि यू.एन.ओ. दबाव एवं अपने लचीलेपन के कारण वैश्विक धरातल पर और ज्यादा कमजोर होता जा रहा है कुछ देश इतने शक्तिशाली, विकसित एवं आत्मनिर्भर हो गए हैं कि वे अपना शासन एवं स्वयं मालिक बन बैठे है और वह दूसरे देशों पर भी अपना शासन थोपते है. यहाँ भी UNO का कठोर नियम एवं अनुशासन का अभाव ज्ञात पड़ता है. जैसे-यू.एस.ए. का मनमाने तरीकों से टैरिफ, चीन का वन रोड वन बेल्ट स्कीम आदि
कुछ देश तो न विकसित एवं न ही शक्तिशाली होने के बावजूद भी अपने रवैये से को बढ़ावा, आईएसआईएस आतंकी घटना डरते नहीं है, जैसे-पाकिस्तान का आतंकवाद का बढ़ता होना
(6) यूरोपीय देशों की अधिकता, अफ्रीकन देशों की गैर-मौजूदगी-UNO में वीटो प्राप्त शक्ति देशों में अधिक संख्या यूरोपीय देशों की ही है. वहीं देशों की संख्या के मामले में सबसे बड़ा महाद्वीप अफ्रीका जहाँ लगभग 54 देश बसे हुए है, लेकिन यहाँ का कोई भी देश स्थायी सदस्य के रूप में नहीं है. जिससे स्पष्ट होता है कि फण्ड, भौगोलिक एवं सम्पन्न देशों के दबाव में अफ्रीका को स्थायी सदस्य का दर्जा नहीं दिया गया, जिस कारण भी UNO में सुधार होने की जरूरत है ताकि सभी महाद्वीपों का वर्चस्व UNO में स्थापित हो सके, जिससे भेदभाव की कमी हो पाए
(7) अस्थायी सदस्य का नाममात्र होना-UNO में हर 2 वर्ष पर 10 अस्थायी सदस्यों का चयन होता है, जो सिर्फ नाममात्र ही होता है. उसका वैश्विक उद्देश्यों, शांति-स्थिरता निर्णायक भूमिका एवं वैश्विक सहयोग में न के बराबर हिस्सेदारी होती है. यदि उनका निर्णय सफल हो भी जाता है, तो वीटो करके वीटो प्राप्त शक्तियाँ उसे निरस्त कर देती है. इसलिए अस्थायी सदस्य को भी शक्ति प्रदान करने हेतु इसमें सुधार होना जरूरी है.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का महत्व /लाभ
• वैश्विक शांति, युद्ध-स्थिरता, सामूहिक सुरक्षा
सहयोगात्मक एवं अनुशासन प्रिय निर्णय
→ सभी संगठनों के साथ तालमेल
पर्यावरणीय तथा पारिस्थितिकी मुद्दों हेतु एवं सतत् विकास में वृद्धि
→ वैश्विक सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक परिदृश्य को जोड़ना
मानवाधिकार एवं अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों को लागू
UNO अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर एक ऐसा सगठन है जिसे यदि लक्षित एवं अनुशासित रूप से क्रमबद्ध किया जाए, तो वह शांति स्थापित. युद्ध-स्थिरता एवं सामूहिक सुरक्षा हेतु अपना प्रमुख योगदान दे सकती है जैसे हाल ही में इजरायल-हमास की शांति वार्ता में एवं द्विराष्ट्र बनने के (फिलीस्तीन) पहल में भी तथ्य रूप से सहमति प्रकट की, ताकि आपसी तनाव खत्म हो और वैश्विक सुरक्षा एवं सहयोग बना रहे
जब देश के भीतर सभी कानून, अनुशासन, सरकार एवं प्रशासन अपने-अपने तरीकों से काम करना बन्द कर देता है, तो उसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों से उम्मीद जागती है कि उसे वहाँ से न्याय एवं अधिकार प्राप्त होगा यू. एन. ओ. भी एक ऐसा मंच है, जिसके 6 अंग अपने-अपने विभागों से अपना कार्य करता है भले ही यह दबाव रूपी हो लेकिन अंतरिम परिणाम तक ये अपना कार्य करते हैं, बस उसके कार्यों में त्वरित एवं अच्छे परिणाम आते-आते जब तक बहुत कुछ नष्ट हो जाता है.
UNO, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और देशों के बीच मैत्रीपूर्ण भाव रखने वाला मंच है. यहाँ सभी वैश्विक राष्ट्र अपना मत. आपसी सुझाव एवं सहकारिता की बात करते हैं, जिससे देशों के लिए कमियों एवं बदलाव को पूरा किया जाता है. विकासशील एवं अविकसित देशों के लिए प्रेरणा स्रोत बनता है. साथ ही सभी संगठनों के बीच ताल-मेल को बढ़ाता है यह स्वयं एक सगठन होते हुए सभी संगठनों का स्वागत करता है और अन्य संगठनों में भी अवांछित प्रावधानों को निरस्त करने की सहमति देता है.
वैश्विक पर्यावरण परिवर्तन, पारिस्थितिकी बदलाव तथा सतत् विकास पर UNO की पैनी नजर है, जिसमें सतत् विकास लक्ष्य हेतु 2030 तक सभी प्रकार के आयामों को लक्षित किया है, जिसमें कुपोषण, भुखमरी, अशिक्षा एवं गरीबी को समाप्त करने का लक्ष्य रखा एवं किसानों की उत्पादकता को और आत्मनिर्भर बनाने की बात कही गई है जिससे उसके उत्पाद को एक उचित बाजार मिल सके .
पर्यावरणीय मुद्दों में ग्लोबल वार्मिंग जीरो कार्बन लक्ष्य प्रदूषण आदि पर विशेष घ्यान केन्द्रित किया गया है जिसमें पर्यावरण संरक्षण वनों के विस्तार के साथ वैश्विक महामारी रोकथाम, आपदा निपटान एवं पारिस्थितिकी सन्तुलन पर भी विशेष बल देते हैं.
UNO विशेषतः मानवाधिकार की बात करता है. विश्व में आतंकवाद को खत्म करत निरस्त्रीकरण यानि परमाणु हथियारों एवं मानव विनाशी अस्त्र-शस्त्र का कम उपयोग की सलाह देता है. आतंकवाद एवं सशस्त्रीकरण सिर्फ मानव-विनाश के लिए, आपसी संघर्ष एवं 1 वैश्विक अस्थिरता लाती है.
वैश्विक सामाजिक, राजनैतिक मामलों के साथ-साथ UNO वैश्विक अर्थव्यवस्था को जोड़ने के लिए भी अथक प्रयासरत होता है. अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिकता में जैसे सतत् विकास, न पर्यावरणीय मुद्दे पर बल, मानवाधिकारों का समन्वय आदि एवं राजनीतिक विकास न में राष्ट्र का प्रशासन, राष्ट्र का स्थायित्व तथा आतंकवाद मुक्त राष्ट्र आदि की बातों को सुलझाता है ठीक उसी प्रकार वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी जोड़ता है जिसमें अंकटाड, UNDP, WHO एवं खाद्य सुरक्षा आदि संगठनों को वित्तीय सहयोग एव तकनीकी सहायता कर आर्थिक स्थिरता एवं विश्व 5 कल्याण की अवधारणा रखता है, जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा मिलता है
UNSC के सन्दर्भ में भारत की भूमिका
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का बदलता - स्वरूप, उसकी नाममात्र की भूमिका विश्व के साथ भारत को भी प्रभावित कर रहा है. भारत - की भी सहमति है कि UNO वैश्विक धरातल - पर एक मजबूत नींव की तरह कार्य करे, जिससे उसके अहम ठोस एवं निष्पक्ष फैसले से विश्व - में शांति, युद्ध-स्थिरता, मानवाधिकार एवं सामूहिक सुरक्षा बनी रहे. यद्यपि भारत भी - UNO का स्थायी सदस्य बनने की योग्यता - रखता है जिसके मुख्य आधार में सर्वाधिक - आबादी वाला देश, सबसे बड़ा लोकतंत्र - स्थापित राष्ट्र के साथ-साथ UNO की नीतियों - का समर्थन करता है. भारत वैश्विक शांति, सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वधर्म समभाव एवं - अन्तर्राष्ट्रीय महत्व एवं भाई-चारे की नीति रखता है.
हाल ही में सम्पन्न UNO के 80वें सत्र के आयोजन में फिलीस्तीन को राष्ट्र का दर्जा देने में सहमति जताई सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो भारत के UNO में स्थायी सदस्य न - बनने का प्रमुख कारण में स्थायी सदस्यों की - सहमति का प्राप्त न होना यदि भारत सदस्य बनता है, तो अन्य देश भी स्थायी सदस्य बनने की शक्ति रखते है. जिसमें दक्षिणी अमेरिका अफ्रीका द. कोरिया, जापान आदि है जिसमें पाकिस्तान चीन का भी हस्तक्षेप भारत के लिए प्रमुख बाधक है भारत की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी उतना सुदृढ़ नहीं है, वैश्विक सूचकांक में भी भारत की स्थिति पिछड़ी हुई है. जैसे-मानव विकास सूचकांक में 130वाँ, इंडेक्स में 105वाँ तथा पर्यावरण प्रदर्शन भ्रष्टाचार सूचकांक में 96वाँ, ग्लोबल हंगर सूचकांक में 176वाँ स्थान भारत की छवि को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करता है. जिस कारण भी ये UNO में स्थायित्व के लिए जगह नहीं बना पा रहे हैं.
अमेरिका का UNO पर वर्चस्व
हाल ही में घटनाओं को गौरतलब किया जाए तो अमेरिका पर किसी तरह का दबाव नहीं है, वह जिस तरह निर्भीक रूप से विश्व टैरिफ नीति, वेनेजुएला एवं ईरान पर अपना ताकत अजमा रहा है और UNO इसे अनदेखा कर रहा है इससे ही स्पष्ट हो रहा है कि UNO वैश्विक परिदृश्य में कितना शक्तिशाली है ? वास्तविकता में कहा जाए, तो UNO पॉवरफुल देशों की कठपुतली सदृश्य हो गया है, जिसमें सुधार अति आवश्यक है।
अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश पर लगाम लगाना, अवैध शक्तियों पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है, वरना ये विश्व पर तानाशाह रवैया अपना सकते हैं.
UNO ही वह माध्यम है जिससे USA और शेष विश्व का आपसी मेल एवं सहमति हो सकती है. अमेरिका UNO में आर्थिक फण्ड एवं बजट का अधिक योगदानकर्ता है. अमेरिकी भूमि न्यूयॉर्क में UNO का मुख्यालय, अमेरिकी नौकरशाही UNO में कार्यरत, वीटो पॉवर का उपयोगी, UNO महासचिव चयन में अमेरिका के समर्थन के साथ-साथ नाटो का भी सदस्य होने की शक्ति से ये मनमानी तरीकों से कार्य करता है, जिसके प्रत्युत्तर में UNO को और निर्भय, कठोर एवं शक्तिशाली बनने की जरूरत है.
इसलिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् को एक मजबूत, अनुशासनप्रिय, कर्तव्यनिष्ठ, निष्पक्ष एवं मानव कल्याणकारी संगठन बनने की आवश्यकता है, वरना आने वाले समय में ये अपना वर्चस्व खो देगी और नाममात्र की भूमिका में एवं शक्तिशाली देशों की कठपुतली संगठन बनकर रह जाएगी अतः इसके लिए इसे अपनी नीति को उचित संशोधित कर एवं सदस्य देशों की आपसी सहमति से बने कल्याणकारी कानून को वैश्विक हित के लिए अग्रसर करना चाहिए
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